लोक गीत
लोक गीत
- मरुस्थलीय क्षेत्र के गीत - रतन राणौ, केवड़ा, घुघरी, डोरा मूमल
- मैदानी भागों के गीत - इन गीतों में भक्ति और श्रृंगार का अद्भुत समन्वय पाया जाता है।
- आदिवासी क्षेत्र के गीत - पटेल्या, लालर बिछियों
विवाह से सम्बन्धित गीत :-
- मोरिया - ऐसी बालिका जिसकी सगाई हो गई एवं विवाह में देरी है, उसके द्वारा गाया जाता है।
- बन्ना-बन्नी - दूल्हे व दुल्हन के लिए गाये जाने वाले गीत
- दुपट्टा - दुल्हे की सालियों द्वारा गाया जाने वाला गीत।
- कामण - वर को टोने-टोटके से बचाने के लिए गाये जाने वाले गीत।
- घोड़ी - वर निकासी के समय गाया जाता है।
- जलो व जलाल- वधू पक्ष की महिलाए वर के बारात के स्थान को देखने जाते समय यह गीत गाती है।
- ओल्यू - बेटी की विदाई के अवसर पर गाया जाता हैं।
- सीठणे - आनन्द व उल्लास के लिए गाये जाने वाले गाली गीत।
- पावणा - नये दामाद के पहली बार ससुराल जाने पर भोजन कराते समय गाये जाने वाले गीत।
क्षेत्रीय गीत :-
- ढोला मारू - सिरोही क्षेत्र में गाया जाने वाला लोक गीत जिसमें ढोला-मारू की प्रेम कथा का वर्णन हुआ है।
- हमसीढ़ो - उत्तरी मेवाड़ के भीलों का प्रसिद्ध लोक गीत जिसे स्त्री व पुरुष साथ मिलकर गाते है।
- बिच्छुडो - हाड़ोती क्षेत्र में गाया जाता है जिसमें मरणासन्न पत्नी जिसे बिच्छु ने डस लिया है अपने पति से दूसरे विवाह की प्रार्थना करती है।
- पछीड़ा - हाड़ोती एवं ढूंढाड़ क्षेत्र में गाया जाता है।
- हिचकी - मेवात (अलवर, भरतपुर) क्षेत्र का प्रसिद्ध गीत जो किसी की याद आने पर गाया जाता है।
- रसिया - ब्रज क्षेत्रों एवं पूर्वी राजस्थान (भरतपुर, धौलपुर, करौली एवं स माधोपुर) में गाये जाते है।
श्रृंगारिक गीत :-
- मूमल - जैसलमेर क्षेत्र में गाया जाता है मूमल के नख-शिख का वर्णन हुआ।
- गोरबन्द - ऊँट के गले का आभूषण कहा जाता है रेगिस्तानी एवं शेखावाटी क्षेत्र में यह गीत गाया जाता है।
- कांगसियो - गणगौर के अवसर पर गाया जाना वाले श्रृंगारिक गीत ।
- काजलियो - होली के अवसर पर चंग वाद्य यंत्र के साथ यह गीत गाया जाता है।
- लावणी - दो तरह की होती है।
- श्रृंगारिक - नायिका नायक को बुलाने के लिए गाती है।
- भक्ति-संबंधी- देवी देवताओ की आराधना मे गाए जाते ह
विरहणी नायिकाओं के गीत :-
- कुरजा- कुरजा एक प्रवासी पक्षी है जिसके माध्यम से नायिका अपने प्रदेश गये पति को सन्देश भेजती है।
- सुपणा- विरहणी नायिका के सपने से सम्बन्धित गीत।
- पपीहा/पपैया - दाम्पत्य जीवन के आदर्श का परिचायक लोक गीत जिसमें नायिका अपने प्रियतम से उपवन में आकर मिलने की प्रार्थना करती है।
- पीपली- रेगिस्तानी एवं शेखावाटी क्षेत्र में श्रावण में तीज के त्योहार से पूर्व गाया जाने वाला गीत जिसमें विरहणी नायिका के प्रमोदगारों का वर्णन हुआ है।
- कागा- इस गीत में विरहणी नायिका अपने परदेश गये पति के आने का शगुन मनाती है और कौए को विभिन्न प्रलोभन देकर उड़ने के लिए कहती है।
- केसरिया बालम मांड शैली का रजवाड़ी गीत जिसे नायिका परदेश गये पति को बुलाने के लिए गाती है।
- चिरमी चिरमी एक वानस्पतिक पौधा है। इस गीत में भाई व पिता की प्रतीक्षारत ग्राम वधू की मनोदशा का वर्णन हुआ है।
- झोरावा जैसलमेर क्षेत्र में परदेश गये पति को बुलाने के लिए नायिका यह गीत गाती है।
- सुवटिया भील स्त्री प्रदेश गये पति को बुलाने के लिए यह गीत गाती है।
देवी-देवताओं से सम्बन्धित गीत :-
1. लागूरिया
करौली क्षेत्र में कैला देवी की आराधना में लागूरिया नृत्य के साथ गाया जाने वाला गीत।
2. राती जगा
नांगल, विवाह, मुंडन, पुत्र-पुत्री जन्म या मनौती पूर्ण होने पर रात भर जाग कर देवी-देवताओं की आराधना में गाये जाने वाले गीत।
3. हरजस
सगुण भक्ति गीत जिसमें राम व कृष्ण की लीलाओं का वर्णन होता है। किसानों का प्रेरक गीत जिसे किसान फसल की बुवाई से पूर्व गाते हैं।
अन्य गीत :-
1. जच्चा / होलर
पुत्र/पुत्री जन्म के अवसर पर।
2. पणिहारी
पानी भरने वाली स्त्री पणिहारी कहलाती है। इस गीत में राजस्थानी स्त्री के पति व्रत धर्म पर अटल रहने को बताया गया है।
3. इंडोणी
नारियल सूत या मुंज की बनी हुई गोल चकरी जो सिर पर बोझा उठाने के काम आती है। महिलाएँ पानी भरने जाते समय यह गीत गाती हैं।
4. बधावा
शुभ या मांगलिक अवसरों पर गाये जाते हैं।
5. हिंडो / हिडोलिया
श्रावण मास में महिलाएँ झूला झूलते समय यह गीत गाती हैं।
6. जीरो
जीरे की फसल शीघ्रता से नष्ट हो जाती है। अतः इस गीत में नायिका अपने प्रियतम से जीरे की फसल नहीं बोने की प्रार्थना करती है।
7. घूमर - गणगौर, विवाह एवं अन्य मांगलिक अवसरों पर घूमर नृत्य के साथ गाया जाता है जलधर सारंग राग पर आधारित है।
8. घुडला - मारवाड़ में घुड़ला नृत्य के साथ यह गीत गाया जाता है।
राजस्थान की प्रमुख मांड गायिकाएँ
मांड राग
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10वीं शताब्दी → जैसलमेर क्षेत्र मांड कहलाता था।
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यहीं से शास्त्रीय संगीत की एक लोक गायन शैली विकसित हुई → मांड गायन।
प्रमुख मांड गायिकाएँ
1. हाजन अल्लाह जिलाई बाई (बीकानेर)
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उपनाम → मरु कोकिला
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गुरु → उस्ताद हुसेन बख्श
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बीकानेर म्यूजिकल स्कूल से शिक्षा (अच्छन महाराज, लच्छू महाराज, शीबू महाराज, अमीर खाँ, शम्सुद्दीन शेख से प्रशिक्षण)
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गायन शैली → मांड, दादरा, ठुमरी एवं नृत्य
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उपलब्धियाँ :
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महाराजा गंगासिंह के समक्ष मांड गायन
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1987 → लंदन के अल्बर्ट हॉल में मांड गायन
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15 मई 1982 → राजस्थान श्री पुरस्कार
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20 मई 1982 → पद्मश्री पुरस्कार
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निधन → 3 नवम्बर 1992
2. स्व. गवरी बाई (पाली)
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विवाह → मोहनलाल (जोधपुर निवासी)
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उपलब्धियाँ :
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1954 → जयपुर, अखिल भारतीय संगीत प्रतियोगिता में भाग लिया
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1986 → केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
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विशेषता → साधा मांड गायन
3. गवरी देवी (पाली)
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पिता → हीरोजी
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माता → गुलाबी
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उपलब्धियाँ :
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1996-97 → जवाहर कला केन्द्र, जयपुर (राज्य स्तरीय संगीत प्रतियोगिता में प्रथम स्थान)
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भैरवी राग से मांड गायन
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4. स्व. मांगीबाई (मेवाड़)
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उपनाम → लोक सुरों की शहनाई
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पिता → कमलराम
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पति → रामनारायण (बड़ी सादड़ी)
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निधन → नवम्बर 2017
5. बन्नो बेगम (जयपुर)
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दरबारी परम्परा की मांड गायिका
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शिष्याएँ → प्रेमकवर और रजनी पाण्डे
6. जमीला बानो (जोधपुर)
अन्य प्रमुख गायिकाएँ / उपनाम
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सीमा मिश्रा → राजस्थान की लता
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रुकमा बाई मांगणियार (रामसर, बाड़मेर) → थार की लता
राजस्थान की फिल्म जगत की जानकारी
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पहली फिल्म → नजरानो (1942)
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पहली रंगीन फिल्म → लाज राखो राणी सती
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पहली बाल फिल्म → डूंगर रो भेद
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प्रथम नायक → महिपाल
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प्रथम नायिका → सुनयना
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प्रथम निर्देशक → G.D. कपूर

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